बड़ी खबर FOR INDIANS: चुनाव में नेता ने झूठ बोला तो वोटर खुद दर्ज करा सकेंगे केस, EC की मंजूरी जरूरी नहीं; सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की उस दलील को भी निर्णायक नहीं माना, जिसमें आयोग ने कहा था कि वह ऐसी शिकायतों पर संज्ञान लेकर मामले के तथ्यों के आधार पर संबंधित जांच एजेंसियों को कार्रवाई के लिए भेज सकता है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग अपने अधिकार क्षेत्र में महत्वपूर्ण संस्था है और उसके दिशानिर्देशों का अपना महत्व है, लेकिन कानून की व्याख्या करना मुख्य रूप से अदालतों का काम है। आयोग की प्रेस विज्ञप्तियां या दिशानिर्देश अदालतों को बाध्य नहीं करते। शीर्ष अदालत ने कहा कि कर्नाटक हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग के पत्र के आधार पर यह निष्कर्ष निकालकर गलती की कि धारा 125A के तहत निजी शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती।
चुनाव में वोट डालने के साथ ही मतदाता के पास अब उम्मीदवार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने का भी अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' की धारा 125-A (गलत हलफनामा दाखिल करना) के तहत किसी निजी व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत कानूनी रूप से मान्य है, और इसके लिए चुनाव आयोग की अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके लिए चुनाव आयोग की मंजूरी लेना जरूरी नहीं है। शीर्ष अदालत के इस फैसले से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की जवाबदेही बढ़ेगी और मतदाताओं को कानूनी तौर पर अधिक ताकत मिलेगी।
VISHNU AGRAWAL EDITOR DAILY INDIATIMES DIGITAL JOURNALISM PLATFORM
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इस मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा था कि मतदाता के पास उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव याचिका दायर करने का अधिकार है, लेकिन वह निजी तौर पर आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं करा सकता। ऐसी कार्रवाई करना चुनाव आयोग का काम है।

चुनाव में नेता ने झूठ बोला तो वोटर खुद दर्ज करा सकेंगे केस, EC की मंजूरी जरूरी नहीं; सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
चुनाव में वोट डालने के साथ ही मतदाता के पास अब उम्मीदवार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने का भी अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' की धारा 125-A (गलत हलफनामा दाखिल करना) के तहत किसी निजी व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत कानूनी रूप से मान्य है, और इसके लिए चुनाव आयोग की अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके लिए चुनाव आयोग की मंजूरी लेना जरूरी नहीं है। शीर्ष अदालत के इस फैसले से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की जवाबदेही बढ़ेगी और मतदाताओं को कानूनी तौर पर अधिक ताकत मिलेगी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इस मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा था कि मतदाता के पास उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव याचिका दायर करने का अधिकार है, लेकिन वह निजी तौर पर आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं करा सकता। ऐसी कार्रवाई करना चुनाव आयोग का काम है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125A के तहत उम्मीदवार के झूठे हलफनामे से जुड़े अपराध में निजी व्यक्ति की शिकायत पर भी अदालत संज्ञान ले सकती है। इसके लिए चुनाव आयोग की अनुमति या शिकायत जरूरी नहीं है।
धारा 125A के तहत चुनाव उम्मीदवार की ओर से नामांकन के दौरान जरूरी जानकारी छिपाने या गलत जानकारी देने पर कार्रवाई का प्रावधान है। इस अपराध के लिए अधिकतम छह महीने की जेल की सजा हो सकती है।
CrPC की धारा 195 को लेकर क्या कहा?
इस मामले में मुख्य सवाल दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195(1) और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125A के बीच संबंध को लेकर था। CrPC की धारा 195 कुछ निर्धारित अपराधों में अदालत के संज्ञान लेने पर प्रतिबंध लगाती है, जब तक संबंधित लोक सेवक या सक्षम प्राधिकारी की ओर से शिकायत न की जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125A को CrPC की धारा 195 के दायरे में शामिल नहीं किया गया है। अदालत के मुताबिक, धारा 125A को जनप्रतिनिधित्व कानून में 2002 में जोड़ा गया था, जबकि CrPC की धारा 195 में संशोधन 2006 में हुआ। इसके बावजूद धारा 125A को प्रतिबंधित अपराधों में शामिल नहीं किया गया। विधायिका की इस चूक को जानबूझकर किया गया फैसला माना जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि अगर विधायिका चाहती कि उम्मीदवार के झूठे हलफनामे से जुड़े मामले में केवल सरकारी अधिकारी ही शिकायत कर सकें, तो इसके लिए धारा 195 में स्पष्ट संशोधन किया जा सकता था।
चुनाव आयोग की दलील भी नहीं मानी
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की उस दलील को भी निर्णायक नहीं माना, जिसमें आयोग ने कहा था कि वह ऐसी शिकायतों पर संज्ञान लेकर मामले के तथ्यों के आधार पर संबंधित जांच एजेंसियों को कार्रवाई के लिए भेज सकता है।
अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग अपने अधिकार क्षेत्र में महत्वपूर्ण संस्था है और उसके दिशानिर्देशों का अपना महत्व है, लेकिन कानून की व्याख्या करना मुख्य रूप से अदालतों का काम है। आयोग की प्रेस विज्ञप्तियां या दिशानिर्देश अदालतों को बाध्य नहीं करते।
शीर्ष अदालत ने कहा कि कर्नाटक हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग के पत्र के आधार पर यह निष्कर्ष निकालकर गलती की कि धारा 125A के तहत निजी शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती।